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वन गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार करके पारितंत्र सेवाओं में संवृद्धि और SLEM ज्ञान का प्रसार पर अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला 

Garhninad Desk
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देहरादून 21मार्च 2023। जलवायु से संबंधी समस्याओं के समाधान में हमारे वन, पारितंत्र से जुड़ी सेवाओं के लिए संजीवनी हैं। जलवायु नियमन के अतिरिक्त जलाऊ लकड़ी, भोजन व अकाष्ठ वन उत्पादों जैसे मूर्त संसाधनों का दोहन वनों से किया जाता है तथा परागण, पर्यावास जैसी अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियां स्वस्थ और समृद्ध वनों पर निर्भर करती हैं। परंतु मानव द्वारा वनों के सीमित संसाधनों के अंधाधुन्ध दोहन और अन्य मानवजनित क्रियाकलापों के कारण वनों का नुकसान हो रहा है और प्रजातियां लुप्त हो रही हैं जो पारितंत्र सेवाओं के निरंतर प्रवाह के लिए चुनौती बन गया है।

अत्यधिक दोहन के कारण, विश्व स्तर पर, पिछले कुछ दशकों में, पारितंत्र में अभूतपूर्व दर से गिरावट आई है और वनों में लगभग 40% की कमी आई है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, भारत सरकार की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर, जैव विविधता और पारितंत्र के नुकसान के कारण 557,666 वर्ग किमी भूमि बंजर हुई है, जिसके कारण कशेरुकी प्रजातियों की 305 प्रजातियां संकटग्रस्त है।

सतत भूमि और पारितंत्र प्रबंधन (SLEM) के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों, वनों, जैव विविधता का संरक्षण और बंजर भूमि की बहाली प्राप्त की जा सकती है। यह स्थानीय लोगों की बढ़ती भागीदारी, जैव विविधता के संरक्षण और पारितंत्र सेवाओं को बनाए रखने के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। पारितंत्र सेवाओं की अवधारणाएं मानव कल्याण के लिए अत्यधिक महत्व रखती है, इसीलिए यह वैश्विक हलचल का केंद्र है। भारत के लिए पारितंत्र सेवाओं का कुल मूल्य (TEV) $1.8 ट्रिलियन/वर्ष है। तराई आर्क परिदृश्य और जिम कॉर्बेट जैसे क्षेत्रों में पारितंत्र सेवाओं का कुल मूल्य क्रमशः 390 बिलियन रुपये ($6 बिलियन) और $2,153,174.3 है।

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के तहत एक प्रमुख अनुसंधान संगठन भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE), देहरादून ने विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित, पारितंत्र सेवाओं में सुधार परियोजना के तहत भारत में SLEM को संस्थागत और नीतिगत मुख्यधारा में लाने के लिए एक रोडमैप विकसित किया है। इस रोडमैप ने भारत के भूमि ह्रास तटस्थता (LDN), राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने में मदद करने के लिए दिशानिर्देश और कार्य योजनाएं प्रदान की हैं।

पारितंत्र सेवाओं के लाभों को नीति निर्माताओं, प्रशासकों और आम जनता के साथ साझा करना आवश्यक है। इस संदर्भ में, भा.वा.अ.शि.प. द्वारा 22 से 24 मार्च, 2023 तक देहरादून में “वन गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार करके पारितंत्र सेवाओं में संवृद्धि और SLEM ज्ञान प्रसार” पर एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। कार्यशाला का उद्घाटन श्री अश्विनी कुमार चौबे, माननीय राज्य मंत्री पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन, भारत सरकार द्वारा किया जाएगा और इसमें विभिन्न देशों के नीति निर्माता, प्रशासक, वैज्ञानिक समुदाय और अन्य हितधारक भाग लेंगे।

यह कार्यशाला पारितंत्र के सतत प्रबंधन के लिए बेहतर विकल्पों की सिफारिश करने और देश के लिए SLEM पद्धतियों के विकास के लिए एक सही दिशा प्रदान करने में योगदान देगी। यह तीन दिवसीय मंथन सत्र न केवल पारितंत्र सेवाओं और पर्यावरण की सुरक्षा को बढ़ाने में मदद करेंगे बल्कि आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील भी बनाएंगे। 


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