शुरुआत: उत्तराखंड राज्य आंदोलन, भुलाये गये नींव के पत्थर

शुरुआत: उत्तराखंड राज्य आंदोलन, भुलाये गये नींव के पत्थर

विक्रम बिष्ट

गढ़ निनाद समाचार* 20 फरवरी 2021

नई टिहरी। टिहरी गढ़वाल में ही लगभग साढ़े चार सौ सरकारी मान्यता प्राप्त उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी हैं। सरकार से मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी का प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए कुछ मानक तय किए गए थे।

1- एलआईयू की रिपोर्ट 2- पुलिस के अन्य अभिलेख यथा डेली डायरी के प्रासंगिक अंश। 3-  प्रथम सूचना रिपोर्ट। 4-  चिकित्सालय सम्बन्धी रिपोर्ट।  

विशेष गौरतलब तथ्य यह है कि राज्य आंदोलनकारियों को चिन्हित करने का निर्णय नारायण दत्त तिवाड़ी सरकार ने किया था। श्री तिवाड़ी सबसे बड़े राज्य आंदोलनकारी थे (शायद?)। राज्य आंदोलन जब चरमोत्कर्ष पर था तब भी तिवाड़ी जी अपने इस संकल्प दृढ़ थे कि उनके जीते जी उत्तराखंड नहीं बनने देंगे।  वास्तविक वाक्य ज्यादा कठोर था।

तिवाड़ी बनाम जितेंद्र प्रसाद+हरीश रावत = मुलायम सिंह यादव सिलसिलेवार विवरण हम प्रस्तुत करते रहेंगे। सरकारी चिन्हीकरण की शर्तों की पालन प्रक्रिया, संशोधन, झोल- मख़ौल आदि इत्यादि भी।

वह जन जनांदोलन था। जनांदोलन पहले भी आंदोलन था। नींव के पत्थर रहे हैं। अगस्त 1994 से पहले भी और उसके बाद भी। उनके योगदान को सायास भुलाने, नकारने के राजनीतिक प्रयासों को नूरा कुश्ती कुशल राज व्यवस्था का सहयोग संरक्षण प्राप्त है। हम उन लोगों के साथ अच्छे बुरे,गौरवशाली, पीड़ादायक यादों को साझा करना चाहते हैं, जो सरकारी खुफिया तंत्र, नियम शर्तों की नजर-पकड़ से दूर रहे आए हैं। आप बीती और आसपास की घटनाओं को “गढ़ निनाद पोर्टल” के माध्यम से साझा कर सकते हैं। हम ऐसे कुछ लोगों की श्रृंखला शुरू कर रहे हैं, संक्षिप्त शब्दों में।

उत्तराखंड राज्य आंदोलन, भुलाये गये नींव के पत्थर-1

1994 में शिक्षकों, कर्मचारियों ने उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए अपनी नौकरियां दांव पर लगा दी थीं। वह जनांदोलन था।उससे पहले भी कई शिक्षक, कर्मचारी रहे हैं जो उत्तराखंड आंदोलन  में किसी न किसी रूप में योगदान देते रहे हैं।

*कृष्ण सिंह नेगी शिक्षक* 

पुराना दरबार  टिहरी के प्राथमिक विद्यालय के कृष्ण सिंह नेगी शिक्षकों की समस्याओं के समाधान के लिए सदैव तत्पर रहते थे। 1987-88 का वह दौर था जब बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग उत्तराखंड राज्य की मांग और मांग करने वालों का उपहास करता था। हम उत्तराखंड के नारे लगाते थे। तो कुछ लोग यह भी कहते, ‘ खण्ड-खण्ड यूं कि मवासी कु होलू।’

सरकारी स्कूल के हेड मास्टर कृष्ण सिंह नेगी बेख़ौफ़ होकर हमारा हौसला बढ़ाते रहते थे।

*जीतमणि भट्ट कर्मचारी*

चमियाला में जीतमणि भट्ट का आवास हमारा ठौर ठिकाना था। उत्तराखंड बंद, प्रदर्शन जो भी कार्यक्रम हों उनकी तैयारी के लिए हम जब भी बाल गंगा क्षेत्र में जाते, निश्चिंत होकर जाते, रहने खाने का जीतमणि भट्ट का कमरा ठहरा। राज्य आंदोलन में भिलंगना घाटी का  योगदान उत्तराखंड क्रांति दल के पहले से है। इंद्रमणि बडोनी यहीं से थे। 31 जनवरी 1979 में दिल्ली बोट क्लब में उत्तराखंड राज्य के लिए बड़ी रैली हुई। पहली बार प्रधानमंत्री से इस बाबत बात हुई। इसका नेतृत्व करने वाले सांसद त्रेपन सिंह नेगी का गांव दला यहीं  स्थित है। 1980 के दशक में उत्तराखंड राज्य के नारों की गूंज पहाड़ों के जिन क्षेत्रों में सुनाई दी अब्बल सिंह बिष्ट के नेतृत्व में उनमें एक भिलंगना घाटी है।….जारी ।

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