अतीत की खिड़की से.. लक्ष्मण और धूम सिंह

अतीत की खिड़की से.. लक्ष्मण और धूम सिंह

विक्रम बिष्ट

कुछ दिन पहले लक्ष्मण सिंह राणा और फिर धूम सिंह जखेड़ी दो साथियों को खोने की खबर मिली है । लक्ष्मण ऋषिकेश में रह रहे थे। बर्षों से मुलाकात हुई नहीं। बस दो तीन बार फोन से बात हुई होगी।  धूम सिंह धनसानी गांव से घनसाली आ गए थे । पत्रकारिता में भी सक्रिय रहे। इसलिए नई टिहरी में यदा कदा मुलाकात हो जाती थी। बीते साल न्यू टिहरी प्रेस क्लब के चुनाव वक्त कुछ ज्यादा समय।  कल इसी क्लब भवन में धूम सिंह को श्रद्धांजलि दी है। टिहरी शहर जोड़ता था बेशक बिछड़ना भी नियति है। स्वास्तिक पिक्चर हॉल की गली से बाहर आते हुए एक युवक ने नमस्कार करते हुए कहा मैं लक्ष्मण सिंह राणा। मेरे अग्रज अब्बल सिंह बिष्ट एवं  करण सिंह बिष्ट का नाम लेते हुए कहा मैं आपको जानता हूं। बडोनी जी के साथ देखा है। भाषण सुना है। उत्तराखंड क्रांति दल में शामिल होना चाहता हूं। फिर दल में ही रहे।

धूम सिंह टिहरी परिसर में पढ़ने आए थे। धूम सिंह से परिचय तो टिहरी में हुआ। तब उक्रांद धूम मचाने के शुरुआती तेवरों में था। विक्रम नेगी, लोकेन्द्र जोशी, सुरेंद्र रावत , परेन्द्र सकलानी, अनिल अग्रवाल और बहुत से छात्र। धूम सिंह भी शामिल हो गए। उक्रांद टूटता बिखरता रहा। कुछ नेताओं के अहंकार के कारण उत्तर प्रदेश के जमाने में जब उत्तराखंड (हरिद्वार के बिना) में पंचायतों के आखिरी बार चुनाव हुए तब भी उक्रांद दो भागों में विभाजित था । जिला परिषद में दोनों गुटों से 1 दर्जन से अधिक सदस्य चुनकर आए थे। उनमें उक्रांद(डी) के दिवाकर भट्ट और उक्रांद के धूम सिंह जखेड़ी भी थे। हम मूर्खों की टोली को लगा कि यह सुनहरा अवसर है बिखरे कुनवे को जोड़ने का।

नतीजन दिवाकर भट्ट जिला परिषद अध्यक्ष पद  के उम्मीदवार घोषित कर दिए गए। लेकिन उक्रांद के प्रतिबद्ध नेताओं जिनमें 1994 के मुलायम सिंह यादव के चेले भी शामिल हो गए थे। इस मासूम कोशिश को कुचल डाला। बलवीर सिंह जी को तीसरा सवार बनाकर मैदान में उतार दिया गया। धूम सिंह डटकर साथ रहे। न भिलंगनावाद और न ठाकुर ब्राह्मणवाद। पैसे तो हमारे पास थे ही कब। चुनाव के दिन नई टिहरी में सेम, धनसानी कफोलगांव से लेकर यहां वहां से रणबांकुरों की फौज बलवीर सिंह नेगी को धूम सिंह का वोट डलवाने के लिए डेरा डाले थी। धूम सिंह अपनी जगह अटल। कुछ दिन बाद उक्रांद अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह पंवार ने मेरे साथ धूम सिंह को भी पार्टी से बाहर कर दिया।

आज दो अगस्त है। इसी दिन पौड़ी में इंद्रमणि बडोनी ने गांधी के अंतिम शस्त्र अनशन के उपयोग की शुरुआत की थी। अपने समर्पित सिपाहियों के साथ 1994 में 5 साल बाद इसी महीने बडोनी जी का आमरण अनशन ‘विदेह’ हुआ। 

कालांतर में धूम सिंह भाजपा में चले गए। आपस में झगड़ने के अभ्यस्त कुनबे में कब तक रहते। लेकिन उक्रांद के मूल में जो संस्कार हैं उसको भूले नहीं। यादों में रहेंगे। कल तक!

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