शादी की उम्र हो गयी है, बात चलाऊं क्या?

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शादी की उम्र हो गयी है, बात चलाऊं क्या?

शनिवार ९ नवंबर * आशीष (आरजे रेडिओ ज़िन्दगी)

नमस्कार दोस्तो, हम अख़बार के ज़रिए देश और दुनिया में क्या हो रहा है ये बड़ी आसानी से जान लेते हैं पर जो हमारे वास्तविक जीवन में घट रहा है उसे देखते हुए भी नजरअंदाज करते जा रहे हैं। मन में चल रही उसी हलचल को अपनी कलम व शब्दों के ज़रिए आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। तो आज जिस विषय पर मैं बात करना चाह रहा हूं वो है – वैडिंग यानि शादी। 

आज मैं बेटियों की शादी के बारे में कुछ बातें आपसे शेयर कर रहा हूँ, जिसको लेकर समाज के कुछ वर्ग के लोग, माता-पिता और यहां तक कि रिश्तेदार भी बहुत चिंतित में रहते हैं। बेटियों के जन्म के साथ ही माता-पिता उसके भविष्य व शादी को लेकर पैसा व गहने इकट्ठा करने लगते हैं, जो कि सोचना लाज़मी भी है। अब जैसे ही बेटी बालिग होती है, घर में विलैन का आना-जाना शुरू हो जाता है! घबराइये मत मैं रिश्तेदारों की बात कर रहा हूँ भाई साहब। जी हां माता-पिता से ज्यादा अगर किसी को लड़की की शादी करवाने की परवाह होती है, तो वो हैं हमारे रिश्तेदार! घर में आते ही वो अपनी पंचलाईन मार ही देते हैं – बेटी सयानी हो गई है कहिए तो बात चलाऊं? ऐसा वो तब तक पूछते रहते हैं जब तक कि माता-पिता का पूरी तरह से ब्रेन वाॅश न कर लें। मतलब अगर माता-पिता न भी चाहें, तो भी वो बेटी पर प्रेशर बनाने लगते हैं, उसे इमोशनल ब्लैकमेल तक कर डालते हैं।

भई मुझे एक बात समझ नहीं आती शादी जैसे खूबसूरत पल को ज़बरदस्ती क्यों थोपा जाता है? क्या बेटियों का जन्म सिर्फ घर का कामकाज, लोगों की देखभाल और जल्दी शादी करने के लिए ही होता है? और बेटियों के जीवन का फैसला करने का हक़ हमने रिश्तेदारों को क्यों दे रखा है? कम्बख्त हर बार एक ही सवाल पूछते रहते हैं। बेटियों को बोझ समझना कुछ लोग ये सोचना कब बंद करेंगे। कोशिश तो ये करनी चाहिए कि पहले जी भर के बेटियों को पढ़ने के लिए कुछ खास कर दिखाने के लिए एन्करेज़ करना चाहिए, उसके बाद शादी तो आराम से हो ही जायेगी। 

अभी तक तो मैं सिर्फ रिश्तेदारों को कोस रहा था, यहां ये सब सुनकर मैं ये सोचने लगा कि कुछ माता-पिता भी अपनी बेटियों की जल्दी शादी कराना चाहते हैं। उनको भ्रम हो जाता है कि अगर टाइम पे शादी नहीं की तो अच्छा रिश्ता नहीं मिलेगा। मगर वो ये ज़रा भी नहीं सोचते कि बेटी की मंशा क्या है? क्या वो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है? इसके बारे में वो क्यों नहीं सोचते? आज हमारे समाज में, हमारे देश में बेटियों ने हर फील्ड में अपने टैलेंट को साबित किया है, अपनी एक अलग पहचान बनाई है। लड़का और लड़की के बीच जो सामाजिक खाई बना दी गई थी उसे खत्म कर दिया है। लड़कियाँ किसी भी मायने में लड़कों से कम नहीं है। आज जितने कीर्तिमान देश में लड़कों ने बनाये हैं उससे कई ज्यादा कीर्तिमान लड़कियों ने बनाये हैं। बात करें बाॅलिवुड, खेल-जगत, राजनीति या फिर बिज़नेस की हर जगह बेटियों ने बाजी़ मारी है, और खुद को साबित भी किया है। 

अब एक और चीज आपके सामने रखनी बहुत ज़रूरी है क्योंकि ये भी सोच आजकल चलन में है कि बहू हमें ऐसी चाहिए जो पूरे घर को सम्भाल ले वो नौकरी पेशा न हो तो ज्यादा बेहतर है, शादी के बाद वो नौकरी न करे। ये एक नई प्रकार की सोच है जो समाज के कुछ वर्ग के लोगों के बीच पनप नहीं है। यहां पर भी अगर आप गौर फरमाएं तो आपको दिखेगा कि किस तरह से लड़कियों को दायरे में बांधने की कोशिश की जा रही है या ये भी कह सकते हैं कि नौकरी पेशा बहू कुछ लोगों को रास नहीं आती है। उनके मन में एक बात बैठ चुकी होती है कि अगर नौकरी पेशा बहू आयेगी तो वो घर को संभाल नहीं पायेगी। आज हमारे देश व समाज में ऐसी संकुचित मानसिकता के भी लोग हैं जो इस तरह की बुरी सोच को बढावा दे रहे हैं। 

बचपन से ही बेटियों को ज़िम्मेदारी का पाठ बढ़ाया जाता है, उन्हें बताया जाता है कि वो पराया धन हैं और शादी करके उन्हें ससुराल भेज देना ही माता-पिता का लक्ष्य हो जाता है। जिसे मौका पाते ही वो पूरा कर देते हैं। एक सवाल का जवाब मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि दोस्तों कि क्या बेटियाँ घर का काम, लोगों को संभालना, जिम्मेदारियों को निभाना, चुप रह कर सब कुछ सहना इन्हीं सब चीजों के लिए पैदा की जाती हैं? उनका अपना कोई अस्तित्व होता है या नहीं? जब तक अपने घर में रहती हैं तो घर का सारा बोझ उन पर होता है, जब ससुराल जाती हैं शादी करके तो वहां की जिम्मेदारियों में उलझ कर रह जातीं हैं। तो क्या लड़कियों की शादी सिर्फ इसलिए की जाती हैं कि वो शादी के बाद नर्स या आया का रोल निभाएं? मेरे सवाल तीखे ज़रूर हैं पर ये आज की सामाजिक मानसिकता पर कड़ा प्रहार हैं जो हमारे समाज में पनप रही है। दोस्तों आज भी मेरे सम्पर्क में कुछ ऐसे लोग हैं जो अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलवा रहे हैं। जब मेरी उनसे बात होती है तब वो ये कहते हैं कि मेरी बेटियां जब चाहेंगी तब शादी करेंगी, मेरा उन पर शादी को लेकर कोई दवाब नहीं है क्योंकि वो कुछ करके दिखाना चाहती हैं। इसलिए मैं उनके सपनों के बीच नहीं आना चाहता? इन शब्दों को एक पिता के मुंह से सुनकर मेरे दिल को सुकून मिला और म नही मन में ये सोचने लगा कि अगर हर माता-पिता ऐसी सोच को बढावा देने लगें तब इस देश की हर बेटियां खुद को साबित कर पायेंगी। रूढीवादी सोच की उन बेड़ियों को अब तोड़ने की ज़रूरत है जिसने आजतक बेटियों को ज़क़ड़कर रखा है। आज मेरे इस आर्टिकल के शीर्षक को देखा होगा और उसमें छिपे मेेरे मकसत को आप समझ ही गए होंगे। 

दोस्तो शादी एक परम्परा है जिसे हम वर्षों से निभाते चले आ रहे हैं। ज़िदगी का एक सुन्दर/ब्यूटिफुल क्षण/पल/मोमेंट होता है ये, इस कलरफुल मोमेंट को ब्लैक एंड व्हाइट करके क्या मिलेगा?। जितने भी पैरेन्टस इस वक्त इस आर्टिकल को पढ रहे होंगे, मैं उन सभी लोगों से यही कहना चाहूँगा कि आप अपनी बेटियों को अच्छा भविष्य/फ्यूचर बनाने के लिए मोटिवेट/प्रोत्साहित करें। इससे पहले मैं अपने शब्दों को विराम दूँ, आप सभी से यही कहना चाहूँगा कि बेटियों को पढाएं, उन्हें आगे बढ़ाए, ताकि उनका विकास हो सके, क्योंकि सोच बदलेगी तभी देश बदलेगा।


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