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अयोध्या मामले में 70 साल बाद सुप्रीम फैसला

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अयोध्या मामले में 70 साल बाद सुप्रीम फैसला

अयोध्या मामले में 70 साल बाद सुप्रीम फैसला: मंदिर वहीं बनेगा लेकिन मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन दे सरकार 

नई दिल्ली।

अयोध्या जमीन विवाद मामले में आज सुप्रीम फैसला आया है। कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े का दावा समाप्त कर दिया है। हम संतुलन पर चलेंगे किसी के पक्ष में नहीं जाएंगे। कोर्ट ने कहा केंद्र सरकार मंदिर निर्माण की कार्यवाही शुरू करे । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन कहीं और जगह पर उपलब्ध कराई जाय। सरकार ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण करेगी साथ ही मुस्लिम पक्ष को कहीं और जमीन दी जाएगी।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने शिया वक्फ बोर्ड की अपील को खारिज कर दिया। इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरकेलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा दिए गए साक्ष्य पर्याप्त हैं। साथ ही कहा कि विवादित स्थल इस्लामिक ढांचा नहीं था। मस्जिद कब बनी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कोर्ट ने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार विवादित जमीन सरकारी है।

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई के मुख्य बिंदु–

  • हिंदू इस स्थान को भगवान राम की जन्मभूमि मानते हैं, यहां तक कि मुसलमान भी विवादित स्थल के बारे में यही कहते हैं: न्यायालय। 
  • न्यायालय ने विवादित स्थल पर पुरातात्विक साक्ष्यों को महत्व दिया। हिंदुओं की यह अविवादित मान्यता है कि भगवान राम का जन्म गिराई गयी संरचना मं ही हुआ था : न्यायालय। 
  • बुनियादी संरचना इस्लामिक ढांचा नहीं थी : न्यायालय। 
  • एएसआई ने इस तथ्य को स्थापित किया कि गिराए गए ढांचे के नीचे मंदिर था : न्यायालय।
  • एएसआई यह नहीं बता पाया कि क्या मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी: न्यायालय। 
  • बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनी थी : न्यायालय। 
  • न्यायालय ने कहा कि पुरातात्विक साक्ष्यों को महज राय बताना एएसआई के प्रति बहुत अन्याय होगा।
  • सबूत है कि बाहरी स्थान पर हिन्दुओं का कब्जा था, इस पर मुस्लिम का कब्जा नहीं था। लेकिन मुस्लिम अंदरूनी भाग में नमाज़ भी करते रहे।
  • बाबर ने मस्जिद ने बनाई थी लेकिन वे कोई सबूत नहीं दे सके की इस पर उनका कब्जा था और नमाज़ की जाती थी जबकि यात्रियों के विवरण से पर चलता है कि हिन्दू यहां पूजा करते थे।
  • 1857 में रेलिंग लगने के बाद सुन्नी बोर्ड यह नहीं बता सका की ये मस्जिद समर्पित थी
  • 16 दिसंबर 1949 को आखिरी नमाज की गई थी।  हाईकोर्ट का यह कहना कि दोनों पक्षों का कब्जा था गलत है उसके सामने बंटवारे का मुकद्दमा नहीं था। मुस्लिम ये नहीं बता सके की अंदरुनी भाग में उनका एक्सक्लूसिव कब्जा था। 
  • शिया वक्फ बोर्ड का दावा विवादित ढांचे को लेकर था जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया।
  • न्यायालय ने कहा कि राजस्व रिकार्ड के अनुसार विवादित भूमि सरकारी है ।
  • रामजन्म स्थान पर एएसआई की रिपोर्ट मान्य है।
  • स्थल पर ईदगाह का मामला उठाना ऑफ्टर थॉट है जो मुस्लिम पक्ष द्वारा एएसआई की रिपोर्ट के बाद उठाया गया।
  • एएसआई के निष्कर्ष की यहां मंदिर था इसके होने के बारे में सबूत।
  • 12 और 16 वीं सदी के बीच यहां मस्जिद थी इसके सबूत नहीं है
  • राम का केंद्रीय गुंबद के बीच में हुआ यह मान्यता है, कोर्ट ने पाया है कि ये वास्तविकता है। क्योंकि सभी गवाहों का यहीं मामन्ना है ये आस्था है जिस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
  • यात्रियों के विवरण को सावधानी से देखने की जरूरत है, वहीं गजट ने  इसके सबूतों की पुष्टि की है। हालांकि मालिकाना हक आस्था के आधार पर नहीं तय किया जा सकता सबूत है कि बाहरी स्थान पर हिन्दुओं का कब्जा था, इस पर मुस्लिम का कब्जा नहीं था। लेकिन मुस्लिम अंदरूनी भाग में नमाज़ भी करते रहे।
  • प्रधान न्यायाधीश ने कहा, सबूत पेश किए गए हैं कि हिंदू बाहरी आहते में पूजा करते थे| विश्वास एक व्यक्तिगत एक मामला है|
  • सूट-5 इतिहास के आधार पर है जिसमें यात्रा का विवरण है| सुन्नी वक्फ बोर्ड के लिए शांतिपूर्ण कब्जा दिखाना असंभव है| मस्जिद कब बनी और किसने बनाई साफ नहीं है|
  • 1856-57 से पहले हिंदुओं को आंतरिक अहाते में जाने से कोई रोक नहीं थी| मुस्लिमों को बाहरी आहाते का अधिकार नहीं था| सुन्नी वक्फ बोर्ड एकल अधिकार का सबूत नहीं दे पाया।

बहरहाल कोर्ट के फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए और देश में भाई चारा बना रहे इसके लिए सबको आगे आना चाहिए। तभी देश मे अमन चैन कायम रहा सकता है।


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