जानिए क्या है चिट फंड (संशोधन) विधेयक 2019?

जानिए क्या है चिट फंड (संशोधन) विधेयक 2019?
जानिए क्या है चिट फंड्स (संसोधन) विधियेक 2019?
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Dr. Rajeev Rana, Economist

हाल ही में संसद के दोनों सदनों में चिट फंड (संशोधन) विधेयक, 2019 पारित किया गया है, जिसका  उद्देश्य मुख्य रूप से पिछले कुछ वर्षो से हो रहे चिट फंड घोटाले को रोकना एवं ऐसी फर्म्स को जो की चिट फंड के जरिये छोटे निवेशकों को चुना लगाती है, को कानूनी धारा में लाना है। यह संशोधन मुख्य रूप से समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के निवेशकों को बचाने के उद्देश्य से तथा सामूहिक निवेश और जमा योजनाओं या चिट फंड के संचालन को कारगर बनाने हेतु लाया गया था।

क्या होती है चिट फंड स्कीम

यह स्कीम “चिट फंड अधिनियम, 1982” की धारा 2 (बी), के अंतर्गत सेक्शन 61 के अनुसार रेगुलेट होती है, जिसका नियंत्रण प्राय राज्य सरकार के अधीन होता है, तथा यह मुख्य रूप से R.B.I एवं सेबी के नियंत्रण से बाहर होता है, क्योंकि यह न तो बैंकिंग प्रणाली का हिस्सा होते है और ना ही नॉन बैंकिंग फ़ाइनेंशियल इनसीटूशन का। अतः यह चिट फंड स्कीम का मतलब होता है कि कोई शख्स या लोगों का समूह या पड़ोसी आपस में वित्तीय लेन देन के लिए एक समझौता करते है, तथा वह  इस समझौते में एक निश्चित धनराशि एक तय वक्त पर किश्तों में जमा की जाती है और परिपक्वता अवधि पूरी होने पर ब्याज सहित लौटा दी जाती है। 

यह चिट फंड कई अन्य नाम से भी चलती है जैसे चिट, चिट्टी, कुरी आदि। यह आम तौर पर गरीबों के लिए वित्त उपलब्ध करने का मुख्य एवं सस्ता स्रोत है। प्रमुख रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ बैंकों और वित्तीय संस्थानों की उपस्थिति नहीं है। कुछ राज्यों में यह चिट फंड स्कीम्स राज्य सरकार द्वारा चलाई जाती है जैसे केरल में उपस्थित “केरला स्टेट फाइनेंस एंटरप्राइज, 1969”, आदि।

क्यों फँस जाते है लोग चिट फंड में?

इसके प्रमुख कारण है, पहला चूंकि हर चिट कम्पनी; एजेंटों का नेटवर्क तैयार करने के लिए पिरामिड की तरह काम करती है. अर्थात जमा-कर्ता और एजेंट को और ललचाया जाता है ताकि वो नया सदस्य लायें और उसके बदले में कमीशन लें, जिसमें इस प्रक्रिया से आरंभिक निवेशकों को परिपक्वता राशि या भुगतान नए निवेशकों के पैसे से किया जाता है तथा यही क्रम चलता रहता है। परन्तु जब जब नकद प्रवाह में असंतुलन या कमी आ जाती है और यह फर्म परिपक्वता अवधि पर पैसे नहीं लौटा पाती। जैसे कि  शारदा चिटफंड घोटाला एवं रोज वैली घोटाला।  

दूसरा पहलू यह है की कुछ फर्म्स चिट फंड जैसी होती है परन्तु यह चिट फंड फर्म नहीं होती, चुकी लोगो में वित्तीय साक्षरता कम होती है तो लोग इन फर्म को भी चिट फंड समझ लेते है, जबकि ये फर्म मुख्य रूप से सेविंग रोटेटिंग एवं साख संघ का काम करती है। जिसके द्वारा ये न तो चिट फंड अधिनियम, 1982 के अंतर्गत आती और न ही  R.B.I एवं सेबी के अधिनियम के अंतर्गत क्योंकि ये नॉन बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनी भी नहीं होती है। अतः ये वित्तीय रेगुलेटरी या नियंत्रण वाले संस्थानों से बच निकलती है।

क्या है संशोधन में?

चिट फंड बिल में कुल फंड कलेक्शन की सीमा को बढ़ा दिया गया है, इसकी मौद्रिक सीमा चार भागीदारों तक 1 लाख रुपये से 3 लाख रुपये और चार से अधिक भागीदारों के अनुसार चिट फंडों की सीमा 6 लाख रुपये से 18 लाख रुपये तक बढ़ जाएगी। एवं सभी कानूनी चिट्स को चिट के रजिस्ट्रार के पास पंजीकृत करना आवश्यक होगा, तथा स्टेट लेवल कोऑर्डिनेशन समितियों अ-पंजीकृत चिट फंड के भागीदारों पर मुकदमा चलाएंगी।

इस संबोधन द्वारा फोरमैन के लिए गए कमीशन की अधिकतम सीमा को 5% से बढ़ाकर 7% कर देता है। जो की चिट फंड के सभी भागीदार एवं उनकी डेपोसिट्स को जमा करवाता है, तथा इसकी परिभाषा को विस्तृत करते हुए सेविंग रोटेटिंग  एवं साख संघ, पोंज़ी स्कीम को भी इसमें मिलाया गया है जिसमे प्राइज चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम्स (बैनिंग) अधिनियम, 1978, के अंतर्गत प्रवर्तन राज्य सरकारों के साथ है, तथा अवैध चिट फंड योजनाओं को परिभाषित और प्रतिबंधित करता है।


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