कोविड-19 लॉकडाउन! शिक्षण एवं अधिगम के मध्य नये आयाम स्थापित करने का अवसर

कोविड-19 लॉकडाउन! शिक्षण एवं अधिगम के मध्य नये आयाम स्थापित करने का अवसर
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डॉ० आशीष रतूड़ी “प्रज्ञेय”
डॉलफिन महाविद्यालय, देहरादून 

“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः”

भावार्थः हम सब के लिये  सभी ओर से कल्याणकारी एवं ज्ञान पूर्ण विचार आयें 

ऋग्वेद मेंं वर्णित उपर्युक्त सूक्ति अपने आप में शिक्षण एवं अधिगम के मध्य एक सबल एवं ज्ञान अर्जन हेतु एक आशावादी विचारधारा को आलोकित करती है। इन्हीं कालजयी ज्ञान के प्रकाश स्तंभों से ही हम सब वर्तमान समय की चुनोतियों का सामना कर सकते हैं।

यदि हमारे सामने चुनौतियां शिक्षण एवं अधिगम की हो तो उसे स्वीकार कर किन्हीं भी विपरीत परिस्थितियों में इन दो मूल्यनिधयों को अविरल रखना मानव जाति के लिये परमावश्यक हो जाता है, क्योंकि शिक्षण एवं अधिगम दोनों ही निरंतर चलने वाली प्रक्रिया हैं और ये वे प्रक्रियाएं है जो प्रतिकूल परिस्थितियों से विश्व को उभार सकती हैं। अतः इनका अविरल चलते रहना अतिआवश्यक है, परंतु बात अगर वर्तमान परिदृश्य की करें तो यह सार्वभौमिक तौर से आसान नही है, क्योंकि भारत जैसे विकाशशील देश में कई भौगोलिक असमानताओं के साथ-साथ प्रत्येक के जीवनयापन के स्तर में भी एक बड़ा अंतर है। कई विषमताओं से भरे देश या राज्यों में इस प्रतिकूल परिस्थितियों में एकसमान शिक्षण एवं अधिगम की संरचना करना अपने आप में एक बड़ा चुनौतिपूर्ण कार्य है। परंतु शिक्षक एवं शिक्षार्थी को हर पल आशावादी होना जरूरी है और वे तो अपना कार्य कर ही रहें हैं। जरूरत है तो इस बात की, कि कैसे इस वर्तमान परिस्थिति में शिक्षण एवं अधिगम में नये आयाम स्थापित हों? और भविष्य में इनकी क्या दिशा होगी? क्या ग्रामीण क्षेत्रों में यह नया मॉडल अंगीकार होगा? और होगा तो इसकी क्या रूपरेखा हमने व राज्य सरकारों ने कर रखी है?

कोरोना वायरस महामारी ने देश भर के शैक्षणिक संस्थानों को बंद कर दिया है। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को बंद करना, छात्रों और शिक्षकों के नियमित शैक्षणिक कार्यशैली को बंद करना, शिक्षा में इस तरह का व्यवधान अपने आप में एक अभूतपूर्व स्थिति है और साथ ही साथ शिक्षकों, शिक्षार्थियों, एवं अभिभावकों के सामने एक अप्रत्याशित चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। इस माहौल ने शिक्षा जगत में एक नया मापदंड रेखांकित कर दिया है, और इस नये परिद्रश्य का कैसे सामना करें? यह सवाल अब हर कोई पूछ रहा है।

इस कोविड-19 लॉकडाउन! की विषम परिस्थिति में उन सभी पहलुओं पर चर्चा एवं विश्लेषण करने का यह अभ्यास हमें शिक्षा में नए लक्ष्य और उद्देश्य निर्धारित करने और आगे बढ़ने में मदद कर सकता है।

प्रतिकूलता में सबलता

जैसा कि हम जानतें हैं इस महामारी के कारण शिक्षण एवं अधिगम हेतु हम सभी को ई-लर्निंग टूल और संसाधनों पर गंभीरता से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है, वास्तव में यह समय अपनी सक्षमता और अवसरों का आकलन करने और नए समय के लिए अपने को सजग करने का एक अच्छा समय है। पूरे देश में शिक्षण संस्थान कई हप्तों से बंद हैं और माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित हैं। अधिकांस अभिभावकों ने अपने बच्चों को ऑनलाइन पाठ्यक्रम अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है, लेकिन छात्र ऑनलाइन सीखने में पूर्ण रुचि नहीं दिखा रहे हैं। अधिकतर शिक्षण संस्थानों ने शिक्षकों से ऑनलाइन सामग्री तैयार करने के लिए कह रखा है, लेकिन यह बात सिर्फ नगरीय क्षेत्रों में ही ज्यादातर सफल हो रही है, जबकि ग्रामीण एवं दूरस्थ इलाकों के अधिकांश शिक्षकों एवं छात्रों को ई-सामग्री तैयार करने एवं उन्हें सही तरीके से प्राप्त करने का कोई अनुभव नहीं है। कुछ विद्यालय एवं विश्वविद्यालय छात्रों को संलग्न करने के लिए कक्षाओं/ पाठ्यक्रमों को ऑनलाइन स्थानांतरित करना चाहते हैं, परंतु यह तकनीकी पूर्ण कार्य कैसे किया जाय? इसे पुर्णतः नही जानते हैं।

ऊपर वर्णित स्थिति एक उदास एवं निरुत्साह पूर्ण तस्वीर पेश कर सकती है, लेकिन यह नहीं होना चाहिए। क्योंकि हम सब को आशावादी होना चाहिए और इसे सकारात्मक रूप से देखना चाहिए। पहली बार कई शिक्षकों, अभिभावकों और छात्रों ने शिक्षा के उद्देश्य के बारे में एक नए तरीके से सोचा और कुछ उपयोगी और प्रासंगिक मुद्दे भी उठाए हैं। इस अभूतपूर्व स्थिति ने उन्हें गंभीर रूप से चीजों पर ध्यान देने पर मजबूर किया है। उन सभी मुदों को केंद्रित करते हुए हम सबके जहन में कुछ दिलचस्प सवाल हैं:

  • क्या ‘शिक्षा’ को भविष्य में एक अलग तरीके से परिभाषित किया जाएगा?
  • क्या अलग तरीके से सीखने की जरूरत है?
  • इस संक्रमण का छात्रों और उनकी शिक्षा पर क्या सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा?
  • छात्रों के ज्ञान और कौशल का आंकलन एवं मूल्यांकन कैसे किया जाना चाहिए? क्या हमारे देश या राज्य में ऑनलाइन शिक्षा सफल होगी? जहाँ लाखों छात्रों के पास कंप्यूटर नहीं है और नाही उन तक इंटरनेट की पहुँच है?
  • घर पर सीखना कितना महत्वपूर्ण है?
  • शिक्षार्थी स्वायत्तता कितनी महत्वपूर्ण है?
  • क्या शिक्षकों पर निर्भर रहना और सीखने के पारंपरिक तरीकों से बंधे रहना अच्छा है? और कई अनगिनित सवाल …

यह बहुत अच्छा है कि मानव की जिज्ञासा प्रश्नों के हल जानने में हो परंतु उन हलों को खोजना भी हमारी प्रकृति में होना चाहिए। इस लॉकडाउन का हमारी शिक्षा प्रणाली पर सकारात्मक प्रभाव होना चाहिए, और इस स्थिति में आराम होने के बाद भी सकारात्मक बदलाव होने नजर आने चाहिए।

प्रतिकूलता में कमजोर कड़ी

नगरों और महानगरों के संभ्रांत स्कूलों में शिक्षण करने वाले शिक्षक गर्व से बता रहे हैं कि वे शिक्षण हेतु ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग करते हैं और अपने छात्रों को डिजिटल माध्यम से लॉकडाउन अवधि का उपयोग करने में मदद कर रहे हैं। कस्बों और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों, सरकारी सहायता प्राप्त और सरकारी स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों एवं छात्रों के बारे में क्या होगा? जहाँ न तो शिक्षकों और न ही छात्रों के पास कंप्यूटर और इंटरनेट की कोई सुविधा उपलब्ध है, उनके पास तो शिक्षण एवं अधिगम की प्राथमिक सामग्रियों का भी अभाव रहता है। इसके साथ ही हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली कई कमजोरियों के बोझ से दबी हुई है जिसमें नवाचार सोच का अभाव, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा, अप्रशिक्षित शिक्षक, असमान पहुँच, परीक्षा-केंद्रित मूल्यांकन और शिक्षार्थी स्वायत्तता की कमी शामिल हैं। कोविड-19 लॉकडाउन के समय ये कमजोरियां बाधा के रूप में बहुत प्रबल तरीके से देश एवं राज्यों के सामने खड़ी नजर आ रही हैं।

रिमोट लर्निंग, डिस्टेंस लर्निंग, होम लर्निंग, ऑनलाइन लर्निंग, ई-लर्निंग, और वेबिनार वे शब्द हैं जो आजकल हम अत्यधिक सुन रहे हैं। हाल ही में राज्य सरकारों ने घोषणा की है कि वह विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के छात्रों के लिए ऑनलाइन कक्षाएं आयोजित कर रही है, लेकिन कुछ शिक्षकों एवं छात्रों का कहना है कि यह कई मामलों में अव्यवहारिक है क्योंकि अधिकांश छात्रों के पास आवश्यक सुविधाएं नहीं हैं। हम सब के सामने भविष्य के कई सवाल चुनौती दे रहे हैं, और हमें यह चुनौती स्वीकार भी करनी चाहिए।

  • क्या देश में हर कोई आधुनिक शिक्षण एवं अधिगम के ई-लर्निंग माध्यम का खर्च उठा सकता है?
  • क्या भारत में ऑनलाइन शिक्षा एक कुलीन अवधारणा है?
  • क्या वर्तमान की डिजिटल असमानता हमारे समाज को विभाजित करेगी और देश में शैक्षणिक विभाजन पैदा करने के अवसर देगी?

अगर बात अपने पहाड़ी राज्य के सूदूर स्थित विद्यालयों एवं महाविद्यालयों की करें तो वहां शिक्षकों एवं छात्रों के पास न तो ऑनलाइन टूल के बारे में कोई जागरूकता नही है, जैसे कि गूगल क्लासरूम, मूडल क्लास आदि और न ही उनका उपयोग करने की विशेषज्ञता है। क्या ऐसे शिक्षकों एवं छात्रों के लिए भी ऑनलाइन कक्षाओं के संचालन एवं उनके अधिगम के बारे में सोचना संभव होगा? क्योंकि बात वर्तमान परिदृश्य की ही नही है यह तो हमारी शिक्षा प्रणाली की कमी है जो हमारे शिक्षकों और छात्रों को रचनात्मक रूप से सोचने और संकट की स्थिति में प्रबंधन करने के लिए प्रशिक्षित नहीं कर पाती है, ऐसे में ई-लर्निंग आदि का सफल क्रियान्वयन का महत्व कम हो जाता है, इसलिए वे सब पारम्परिक कक्ष-कक्षाओं से ऑनलाइन क्लासरूम तक के बदलाव के लिए तैयार नहीं हो पाते हैं।

प्रतिकूलता में शुभ अवसर

सभी कार्य प्रणालियों में सबलता और कुछ कमजोर कड़ियों का होना स्वभाविक है। हमारा लक्ष्य अपनी सबलताओं को औऱ अधिक दृढ़ करना और अपनी कमजोरियों को कम करने के अवसर ढूंढने चाहिए। वर्तमान में हमारे पास निम्न मुख्य अवसर हैं:

  1. आधुनिक पीढ़ी – हमारे छात्र जिन्हें हम जेड जेनरेसन भी कह सकते हैं
  2. बड़ी संख्या में ई-लर्निंग के वेब संसाधन हैं, और
  3. सबसे महत्व पूर्ण उत्साही शिक्षक एवं छात्र हैं।

आधुनिक पीढ़ी के शिक्षार्थी (जिनका जन्म 1997 और 2015 के बीच हुआ हो) अपने आप में वास्तविक तौर से डिजिटल अधिगम या लर्निग के मुख्यतः मूल शिक्षार्थी हैं। क्योंकि वे डिजिटल युग में पैदा हुए हैं और कम उम्र से ही कंप्यूटर, मल्टीमीडिया सामग्री और इंटरनेट आधारित गतिविधियों से परिचित हैं। वे हर पल ऑनलाइन वातावरण में रहते हैं, यू-ट्यूब वीडियो देखने का आनंद लेते हैं, सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों से जुड़ना पसंद करते हैं और प्रौद्योगिकी की भाषा बोलते हैं, इस तरह की पीढ़ी को अलग तरीके से सिखाया जाना चाहिए। यह उचित समय है जब हम अपनी कक्षाओं को एक अलग मंच पर ले जाने, ई-लर्निंग की शुरुआत करने और छात्रों में सीखने की स्वायत्तता विकसित करने का निर्णय ले सकते हैं।

अगर हम आशावादी दृष्टिकोण से देखें तो कहा जा सकता है कि कोविड-19 लॉकडाउन ने शिक्षकों को रचनात्मक बनने में सक्षम बनाया है। वे अब यू-ट्यूब वीडियो और पी.पी.टी. जैसे ई-मैटेरियल बना रहे हैं और अपने छात्रों के साथ नियमित रूप से शैक्षणिक सामग्री साझा कर रहे हैं।

अधिकांश शिक्षक ऑनलाइन शिक्षण के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं जैसे कि ज़ूम और ब्लूजेंस मीटिंग आदि का उपयोग कर रहे हैं। इस तरह से इस लॉकडाउन अवधि में भी वे शिक्षण एवं अधिगम की क्रिया को निरंतर रखे हुये हैं।

प्रतिकूल समय में बड़ी चुनौतियां

भारत अभी भी कई विकासशील देशों से बहुत पीछे है जहाँ डिजिटल शिक्षा पर पिछले दशक से काफी ध्यान दिया जा रहा है। उन विकसित एवं कुछ विकासशील देशों में जहां ई-लर्निंग लोकप्रिय है, छात्रों के पास विभिन्न ऑनलाइन संसाधनों जैसे कि मैसिव ओपन ऑनलाइन पाठ्यक्रम (एम ओ ओ सी) की काफी सुविधा है, ये संसाधन छात्रों, शिक्षकों और पेशेवरों को अपने कौशल को अपग्रेड करने में निश्चित तौर पर मदद करते हैं। जहाँ एक ओर ई-लर्निंग शिक्षार्थी की स्वायत्तता को बढ़ावा देता है वहीं दूसरी ओर छात्रों को शिक्षकों के आधार पर ज्ञान और कौशल प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। भारत को कई विकसित और विकासशील देशों की समांतर श्रेणी में आने के लिए इस तथ्य को गंभीरता से लेते हुए ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहने के लिए इसे प्रत्येक राज्य में बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

यदि संक्षेप में कहा जाय तो, शिक्षण एवं अधिगम निरंतर चलना चाहिए। छात्रों को सीखते रहना चाहिए। लॉकडाउन की अवधि उत्पादक होनी चाहिए। शिक्षकों को रचनात्मक रूप से सोचना चाहिए और शिक्षण के नवाचार तरीकों का परिचय देना चाहिए। ऐसे देश में जहां इंटरनेट और हाई-स्पीड कनेक्टिविटी की पहुंच एक समस्या है, और डिजिटल विभाजन एक मुद्दा है, ऐसे में चुनौतियों का समाधान करना महत्वपूर्ण है। जो लोग शिक्षा योजना और प्रशासन में शामिल हैं, उन्हें देश में डिजिटल विभाजन को कम करने और डिजिटल सीखने को लोकप्रिय बनाने के लिए एक गंभीर विचार करना पड़ेगा। अपने इस लेख के साथ ही मैं अपने सभी शिक्षक मित्रों से एक आह्वान करता हूँ

“आओ साथी कुछ ऐसा माहौल बनाये
शिक्षक पद की गरिमा को और बढ़ाये।
राह भरी है पीड़ाओं से कष्टों से पथ भृष्टों की,
क्यों न इन नन्हे नक्षत्रों को, हम इनका आकाश दिखायें।।”


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