राजनीति: कांग्रेस- अढ़ाई कोस चलने के बाद

राजनीति: कांग्रेस- अढ़ाई कोस चलने के बाद
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विक्रम बिष्ट

100 दिन अढ़ाई कोस दूरी तय करने के बावजूद उत्तराखंड कांग्रेस के खेमों में कोई उत्साह दिखाई नहीं दे रहा है। कहने को राज्य कांग्रेस संगठन में फेरबदल में संतुलन रखा गया है। कुल जमा शेष 10 विधायकों वाली पार्टी में चार कार्यकारी अध्यक्ष, यदि यही संतुलन है तो असंतुलन किस चिड़िया का नाम था !

नये अध्यक्ष के ऊपर चुनाव संचालन समिति स्थापित की गई है। समन्वय समिति का अर्थ यही है कि पार्टी संगठन के भीतर समन्वय का लगभग अकाल है। पार्टी नेताओं से लेकर उनके बफ़ादारों के बयानों से लगता है कि कांग्रेस के तांगे के घोड़ों की इधर उधर खींचतान जारी रहने वाली है। तांगे की दिशा, गति क्या होगी फिलवक्त कल्पना ही की जा सकती है।

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही संभावित है। उत्तराखंड क्रांति दल ने बेहतर करने की संभावनाएं बहुत हद तक गंवा दी हैं। दल ने इन बरसों में अपने मूल मुद्दों पर सार्थक अभियान चलाया होता तो उक्रांद बीते चुनाव में कांग्रेस की स्थिति तक पहुंच सकता था।

सत्ता से नाराजगी भाजपा को नुकसान पहुंचाएगी यह तय लग रहा है। कांग्रेस की आशाओं का मुख्य सहारा यही है। कैबिनेट मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंशीधर भगत ने एक बार अपने विधायकों को चेताया था कि सिर्फ मोदी के नाम से अगला चुनाव नहीं जीता जाएगा। विधायकों का कामकाज टिकट से लेकर चुनावी रण में सबसे महत्वपूर्ण कारक रहने वाला है। 

फिर भी संगठन, अनुशासन और संसाधनों के मामले में कांग्रेस भाजपा से बहुत पीछे है। न राष्ट्रीय और न प्रांतीय नेतृत्व के नाम पर कांग्रेस को वोट मिलने वाले हैं । कईयों को तो अपनी टोपी बचानी ही गनीमत होगी। 

भाजपा संगठन के ऊपर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुशासन का असरदार चाबुक है। असंतुष्ट होकर इधर-उधर या घर बैठने वालों की भाजपा में खैर नहीं होती है। मोदी के साथ दिल्ली के दावेदार योगी आदित्यनाथ का सहारा तो है ही।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आप भी दिल्ली की ही तरह कांग्रेस की जड़ों में तेजाब डालने का काम करेगी। उत्तराखंड विधानसभा के पहले, दूसरे चुनावों में बसपा ने हरिद्वार, उधमसिंह नगर में धमाकेदार जीत कर तीसरी पार्टी का दर्जा हासिल किया था। हरीश रावत ने बसपा को कहीं का नहीं छोड़ा है। सपा का भी इन क्षेत्रों में अच्छा आधार रहा है। इस वोट बैंक के कांग्रेस की तरफ खिसकने की  संभावनाओं पर आप पलीता लगा सकती है। 

बहरहाल कांग्रेस को भाग्य से छींका टूटने की आस का ही सहारा है।


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Govind Pundir

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