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बूढ़ाकेदार: गुरू कैलापीर मेला 27 नवम्बर से शुरू होगा

बूढ़ाकेदार: गुरू कैलापीर मेला 27 नवम्बर से शुरू होगा
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तीन दिवसीय बूढ़ाकेदार का प्रसिद्ध तीन दिवसीय कैलापीर मेला 27 नवंबर से

  • अपने ईष्ट देव गुरू कैलापीर के साथ खेतों में दौड़
  • 25 को छोटी व 26 नवंबर को मनाते हैं बड़ी दीवाली

बूढ़ाकेदार- टिहरी गढ़वाल: उत्तराखंड देव भूमि है। यहां की सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखने के लिए आज भी थौल और मेलों की परंपरा कायम है। मंगसीर का महीना बड़ा ही धार्मिक एवं पवित्र माना जाता है। बूढ़ाकेदार क्षेत्र में मंगशीर माह में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक गुरु कैलापीर मेले में ग्रामीण अपने ईष्ट देव गुरू कैलापीर के साथ खेतों में दौड़ लगाते हैं। यह दौड़ आकर्षण का केंद्र होती है। बूढ़ाकेदार की पूरी पट्टी के लोग देवता के साथ खेतों में दौड़ लगाते हैं। इस बार यह दौड़ 27 नवंबर को आयोजित होगी। इसी दिन से तीन दिवसीय बूढ़ाकेदार मेला शुरू होगा। कैलापीर मेला पौराणिक व ऐतिहासिक होने से साथ ही अपनी विशिष्ट संस्कृति के लिए जाना जाता है।

25 व 26 नंवबर को मनाएंगे बग्वाल

मेले से पहले 25 व 26 नंवबर को बूढ़ाकेदार क्षेत्र में मंगशीर की दीवाली मनाई जाएगी। कार्तिक की दीपावली के ठीक एक माह बाद बूढ़ाकेदार क्षेत्र में मंगशीर की यह दिवाली मनाई जाती है। यह अनूठी परंपरा गांव में आज भी कायम है।

क्षेत्र की खुशहाली व अच्छी उपज को लगाते हैं दौड़

कैलापीर देवता के नाम से हर साल आयोजित होने वाले इस मेले की शुरुआत पांच सौ वर्ष पूर्व हुई थी। यह परंपरा आज भी कायम है, जो क्षेत्र के लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़े हुए है। देवता के साथ ग्रामीण पुंडारा नामे सेरा में देवता के निशान के साथ खेतों में दौड़ लगाते हैं। क्षेत्र की खुशहाली व अच्छी उपज के लिए यह दौड़ लगाई जाती है।

27 नवंबर को देवता के निशान के होंगे दर्शन

मेले के पहले दिन 27 नवंबर को गुरू कैलापीर देवता का निशान को लोगों के दर्शनार्थ के साथ ढोल-नगाड़ों के साथ बाहर निकाला जाएगा। इसके बाद देवता के साथ ग्रामीण पुंडारा नामे सेरा में एकत्रित होंगे जहां वे देवता के निशान के साथ खेतों में दौड़ लगाएंगे। इसके बाद देवता से सभी आशीर्वाद लेते हैं। इस दौड़ में शामिल होने के लिए क्षेत्र से बाहर रहने वाले लोग भी गांव पहुंचने शुरू हो गये हैं। इस दौड़ को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है।

पुंडारा नामे तोक में नहीं बनाए जाते मकान

पुंडारा नामे तोक में जिन खेतों में देवता की दौड़ होती है वहां पर मकान नहीं बनाए जाते हैं वह इसलिए कि इन खेतों में देवता दौड़ लगाता है। ग्रामीणों की देवता के प्रति अटूट श्रद्धा है, इसलिए वर्षों से अभी तक यहां पर किसी ने भी खेतों में मकान आदि का निर्माण नहीं किया। देवता को प्रसन्न रखने के लिए किसी के द्वारा भी खेतों में निर्माण कार्य नहीं किया जाता है। देवता को जो भी निर्णय होता है वह सभी को मान्य होता है।

कैलापीर को सरकारी मेला घोषित करने की मांग

बूढ़ाकेदार क्षेत्र धार्मिक पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण है, ऐसे में यदि इस मेले को सरकारी स्वरूप दिया जाता है तो यहां पर्यटन की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। हालांकि जन प्रतिनिधियों ने इसे सरकारी मेला घोषित किए जाने का कई बार आश्वासन दिया, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हो पाई। कई बार तो मेले में सरकारी विभागों की ओर से स्टॉल भी नहीं लगाए जाते। इसके बावजूद क्षेत्र के लोग पूरी आस्था के साथ मेले का भव्य रूप से आयोजन करते हैं। बूढ़ाकेदार धार्मिक पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इसलिए गुरु कैलापीर मेले को सरकारी मेला घोषित किया जाना चाहिए।


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