1974 के बाद फिर से बयाली-हरन्ता के जंगलों पर चली कुल्हाड़ी-आरियां

1974 के बाद फिर से बयाली-हरन्ता के जंगलों पर चली कुल्हाड़ी-आरियां

गढ़ निनाद समाचार।

उत्तरकाशी, 14 अप्रैल 2021। 1974 के चिपको आंदोलन के बाद से एक बार फिर उत्तरकाशी-लम्बगांव मोटर मार्ग पर चौरंगी खाल इलाके में उत्तरकाशी वन प्रभाग के अंतर्गत बयाली और हरन्ता के जंगलों में  ठेकेदार द्वारा सूखे पेड़ों की आड़ में रई और मुरेन्डा के हरे वृक्षों का अवैध कटान करने का मामला प्रकाश में आया है।

यह जंगल गणेशपुर-मानपुर- कुमारकोट गांव के ऊपर हैं, जहां ग्रामीणों की आवाजाही बेहद कम है। पिछले दिनों से जंगलों में बड़ी संख्या में सूखे पेड़ों की आड़ में इन हरे अवैध पेड़ों का कटान किया गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि उत्तरकाशी वन प्रभाग और जिला प्रशासन की नजर अभी तक इन अबोध जंगलों पर नहीं पड़ी है या जानबूझ कर कार्यवाही नहीं की गयी है।

जिस कारण अवैध कटान और चिरान किया जा रहा है। 

आपको बता दें कि पिछले दिनों कैलापीर देवता के नेजा-निशान को ले जाते हुए कुछ ग्रामीणों की नजर जब इस अवैध कटान पर पड़ी तो उनके द्वारा सूचना मीडिया को दी गई । जंगलों में स्लीपरों, हरी टहनियों और पत्तियों का ढ़ेर साफ दिखाई दे रहे हैं। ठेकेदार द्वारा वन प्रभाग से मिलीभगत के चलते सूखे पेड़ों की आड़ में हरे पेड़ों पर आरी और कुल्हाड़ी चलाई जा रही है लेकिन वन प्रभाग मौन है।

आपको बता दें 1974 में जब चिपको आंदोलन शुरू हुआ था उस दौरान भी बयाली के जंगल का नीलाम किया गया था, तब भी बड़ी संख्या में सूखे पेड़ों की आड़ में हरे पेड़ों का कटान किया गया था। उस दौरान उत्तरकाशी के कुछ संभ्रांत जनप्रतिनिधियों द्वारा इसका कड़ा विरोध किया गया था तब जाकर कटान रुक पाया था । लेकिन आज फिर बयाली-हरन्ता के इन जंगलो पर कुल्हाड़ी और आरियां चल पड़ी हैं। देखना है कि कब जिला प्रशासन और वन विभाग की नींद खुलती है। एक ओर पूरे उत्तराखंड में जंगल आग की चपेट में हैं और दूसरी ओर बचे खुचे इन जंगलों पर आरी और कुल्हाड़ी की मार पड़ रही है। बेचारे जंगल। 

जंगल हैं तो जल है, जल है तो जीवन है।

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